श्री मदनमोहनजी का मंदिर:
यह व्रज के प्राचीन मंदिरों में से एक है। इसका शिखर लाल पत्थरों से बना है।
अद्वैतवत:
यहाँ अष्टसखियों के सुंदर मंदिर हैं।
श्रृंगारवत:
यह श्री मदनमोहनजी के मंदिर के पास स्थित है। यहाँ बाँस के कई वृक्ष हैं। यहाँ बाँस पर सामवेद का गान किया जाता था। श्री कृष्ण ने एक बाँस के वृक्ष के नीचे श्री राधिकाजी का श्रृंगार किया था। यहाँ श्री राधिकाजी की बैठक जी और उनके चरणों के निशान भी हैं।
श्री बांकेबिहारीजी का मंदिर:
यह वृंदावन का एक बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। इसका निर्माण विशाल और सुंदर है।
अष्टलालजी का मंदिर:
श्री गुसाईजी के सात पुत्र थे। ब्राह्मण तुलसीदास सारस्वत श्री गुसाईजी के सेवक थे। वे श्री गुसाईजी के जलघरिया थे। उनके माता-पिता का निधन बचपन में ही हो गया था, इसलिए वे श्री गुसाईजी के सातों पुत्रों के साथ खेलते थे। इसीलिए वे खुद को श्री गुसाईजी का आठवां पुत्र समझते थे। श्री गुसाईजी ने उनका पालन-पोषण अपनी देखरेख में किया था। एक बार एक वैष्णव श्री गुसाईजी के दर्शन के लिए आए। उन्होंने गुसाईजी से पूछा, "आपके पुत्र कहाँ हैं?" खवास उन्हें बुलाने गए। इसी बीच तुलसीदास आए और श्री गुसाईजी की गोद में बैठ गए। वैष्णव ने पूछा, "यह कौन है?" श्री गुसाईजी ने कहा, "यह मेरा आठवां पुत्र है।" श्री गुसाईजी ने अपने सातों पुत्रों को सात स्वरूप दिए। तब तुलसीदास ने विनती की, "आपने मुझे कुछ नहीं दिया।" श्री ठाकुरजी ने श्री गुसाईजी को आदेश दिया: उनकी भी सेवा कीजिए। अनेक दिव्य प्राणी उनकी शरण में आएंगे। अतः श्री गुसाईजी ने श्री गोपीनाथजी ठाकुरजी की सेवा उन्हें सौंप दी और आदेश दिया: आप सिंध जाइए। हम वहां नहीं जा सकते। वहां के दिव्य प्राणियों को अष्टाक्षर मंत्र दीजिए और उन्हें ईश्वर की शरण दीजिए। ब्रह्मसंबंध के लिए उन्हें यहां भेजिए। अतः तुलसीदासजी यह आदेश प्राप्त करके सिंध चले गए। वहां वैष्णवों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी। विभिन्न गांवों में मंदिर बनाए गए। जब सिंध प्रदेश का पाकिस्तान में विलय हुआ, तो आठवें पुत्र का वंश भारत आया। हरिद्वार में चार-पांच परिवार, आगरा-दिल्ली में दो-दो परिवार और जयपुर-मथुरा-वृंदावन में चार-छह परिवार बस गए।
श्री राधावल्लभजी का मंदिर:
यह मंदिर बांकेबिहारीजी के मंदिर से आगे स्थित है। इस मंदिर का निर्माण हितहरिवंशजी के सेवक सुंदरलाल कायस्थ ने हितहरिवंशजी के ठाकोरजी के लिए करवाया था। यहां से आगे बढ़ने पर डांगाली, मंगाली, यमुनागली और कुंज गली आती हैं।
सेवाकुंज (गहवरवन):
यहां छोटे-बड़े वृक्षों का सुन्दर कुंज है। वे हमें प्राचीन निकुंज की याद दिलाते हैं।
श्री शालिग्रामजी का मंदिर:
यह लोई बाज़ार में स्थित है। यहां शालिग्रामजी का विशाल सवा पुरुष स्वरूप स्थित है। इतना बड़ा स्वरूप कहीं नहीं मिलता। निधिवन:
स्वामी हरिदासजी के सेवास्वरूप श्री बाँकेबिहारीजी यहीं पाये गये। इसीलिए इस वन को निधिवन कहा जाता है। यहां हरिदासजी की बैठक, वेणुकुंड, विशाखाकुंड, श्रृंगार मंदिर और रासचोत्र हैं। यहां नियमित रूप से रास किया जाता है।
बंसीबत:
वृंदावन के महत्वपूर्ण स्थानों में से एक है। यहाँ एक दोहा प्रसिद्ध है:
श्री वृंदावन सो वन नाहि, नंगां सो गां, बंसीबत सो बात नाहि, श्री कृष्ण नाम सो नाम।
यहाँ श्री कृष्ण वड़ के वृक्ष के नीचे बैठकर बांसुरी बजाते थे। यह श्री कृष्ण का सबसे प्रिय स्थान था। यहाँ एक रासचोत्र है। प्रतिदिन सुबह 10:00 बजे यहाँ रास का आयोजन होता है। यहाँ ठाकुरजी दोपहर में छक्कर खाते थे।
श्री गोपेश्वरजी महादेव:
यह व्रज के आठ प्रसिद्ध महादेवजी में से एक है। श्री कृष्ण के परपोते श्री व्रजभानजी ने इसकी स्थापना की थी।