प्राप्तयोग बहुलवनं लता-जालं समन्वितं।तत्र स्वेद-संयुक्तं दृष्ट्वा सर्वसखिजनं।।रागतु मेघमाल्हारं जागो वंशीधरः स्वयं।स्वयं साधुस्तु त्रैव ववृषु मेघांबूकनमस्तथा।।
गाय चरावत् कृष्ण जु तिन्मे बहुला गाय।भयौ सुतके नाम्सो बहुलवनर्ससय।।
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