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शंकरषकुंड

चंद्रसरोवर से अनीयोर जाते समय शंकरषकुंड आता है। एक दिन कुंभंदास का शरीर दुर्बल हो गया। उस समय वह शंकरषकुंड पर आया और बैठ गया। चतुर्भुजदासजी ने कहा कि मैं आपको यमुनावत ले चलूँ। इस पर श्री कुंभंदासजी ने कहा कि मैं कुछ ही क्षणों में अपना शरीर त्याग दूंगा, इसलिए मैं कहीं नहीं जाना चाहता। आप आर्टी और भोग का दर्शन करके वापस आ जाएँ।

चतुर्भुजदासजी दर्शन करने गए। उस समय श्री गुसाईंजी ने श्री कुंभंदासजी के बारे में पूछा और उन्हें देखने आए। श्री कुंभंदासजी ने दिव्य दर्शन प्राप्त किया और पद गाए। फिर वे अपने स्थान पर चले गए। यहाँ कुंभंदासजी का श्री गिरिराजजी का द्वार है।