मोतीकुंड:
तेर कदंब जाते समय मार्ग में मोतीकुंड आता है। जब श्री वृषभानजी ने अपनी पुत्री श्री राधाजी का विवाह श्री कृष्ण से किया, तब उन्होंने मोतियों का एक हार भेंट किया। परंपरा के अनुसार श्री नंदरायजी को उससे भी अधिक मूल्यवान उपहार देना था।
श्री कृष्ण उस हार को पहनकर मोतीकुंड आए और वहाँ उस हार को तोड़कर एक-एक मोती भूमि में बो दिए। फिर वे घर जाकर नंदबाबा से बोले कि उन्होंने मोती बोए हैं, अब मोती उगेंगे। आइए, मैं दिखाता हूँ।
फिर श्री कृष्ण ने छोटे-छोटे पौधे दिखाए जिन पर बड़े-बड़े मोतियों के गुच्छे लगे थे। इसी कारण इस स्थान का नाम मोतीकुंड पड़ा।
श्री कृष्ण यहाँ से मोती तोड़कर माला बनाते थे और उन्हें गायों तथा व्रजवासियों को देते थे। यह भी इस स्थान के नामकरण का एक कारण है।
फूलावरीकुंड:
यहाँ श्री कृष्ण ने सखी का रूप धारण करके फूल तोड़ने की लीला की थी।
तेर कदंब:
यहाँ श्री ठाकोरजी ने गाय चराना आरंभ किया था। वे यहाँ कदंब के वृक्ष पर चढ़ते थे और अपनी बांसुरी की धुन से गायों को नाम लेकर बुलाते थे। यहाँ वे चाक (भोजन) करते थे और अपनी गायों को लड्डू खिलाते थे।
रूप सनातन की कुटिया:
एक बार गौड़ीय वैष्णव भक्त रूप सनातनजी ने खीर खाने की इच्छा की। श्री राधाजी स्वर्ण पात्र में खीर लेकर आईं, उसे लाल वस्त्र से ढककर कहा— “महात्मा, यह खीर ले लीजिए, मेरी माता ने भेजी है।”
रूप सनातनजी ने पूछा— “तुम किसकी पुत्री हो?”
श्री राधाजी ने उत्तर दिया— “मैं एक अहीर की पुत्री हूँ। मेरी गाय भाग रही है, मैं बाद में आकर पात्र ले जाऊँगी।”
जब उन्होंने पात्र खोला तो स्वर्ण का पात्र देखकर समझ गए कि श्री राधाजी ने उन पर कृपा की है।
आसकुंड:
तेर कदंब से नंदगाँव जाते समय आसकुंड आता है। यहाँ महादेवजी श्री कृष्ण के दर्शन की इच्छा से आए थे।
उद्धव क्यारी:
उद्धव क्यारी जाते समय कृष्णकुंड, जलविहार कुंड, सूरज कुंड और जोगिया कुंड आते हैं। आगे झगड़ा कुंड आता है, जहाँ श्री कृष्ण ने अपने सखाओं के साथ झगड़ा किया था।
इसके बाद कूहक कुंड आता है, जहाँ गोप बालक भयभीत हो गए थे। आगे लेवका कुंड आता है, जहाँ श्री कृष्ण ने “लेव-लेव” कहकर अपने सखाओं को अधिक महाप्रसाद खिलाया।
इसके बाद भंडारबट आता है, जहाँ श्री नंदरायजी का विशाल भंडार था। आगे अक्रूरकुंड आता है, जहाँ अक्रूरजी ने कंस का संदेश श्री नंदरायजी को दिया था। यहाँ अक्रूरजी की बैठक भी है।
इसके बाद चीरतलाई, फिर उद्धवकुंड, उद्धव क्यारी, उद्धव कदंबड़ी और उद्धवजी की बैठक आती है।
हाउबिलाऊ:
जब छोटे बच्चे शरारत करते हैं तो माताएँ उन्हें “हाऊ” कहकर डराती हैं। उसी प्रकार श्री यशोदाजी भी बाल कृष्ण को “हाऊ” कहकर डराती थीं।
यह स्थान उद्धव क्यारी से आगे नंदपोखर के पास है। यहाँ यशोदा कुंड, मधुसूदन कुंड तथा एक ही छत्र के नीचे श्री नंदरायजी की बैठक, श्री यशोदाजी का मंदिर और श्री बलदेवजी का रासचौता है।
पूर्णमासीजी का मंदिर:
नंदगाँव से अंजनोखर जाते समय पूर्णमासीजी (शांडिल्य ऋषि की पत्नी और श्री नंदरायजी की पुरोहित) का मंदिर पड़ता है।
खिदरवन:
यह नंदगाँव से अंजनोखर के मार्ग में स्थित है। बारह वनों में से यह छठा वन है। यह श्री बलदेवजी की सखी का वन है।
यहाँ शंखचूड़ ने गायों को डराकर भगा दिया था, इसलिए इस स्थान का नाम खिदरवन या खदिरवन पड़ा। गाँव का नाम खायरो है।
यहाँ भगवान ने बकासुर का वध किया था। इसके बाद भगवान थक गए थे, तो व्रजवासियों ने उनके चरण दबाकर और पंखा झलकर सेवा की। इसलिए इस गाँव का नाम खायरो पड़ा।
कुंडलवन:
यह नंदगाँव के पास है। यहाँ श्री ठाकोरजी का कुंडल खो गया था, जिसे गोपियों ने पाया था।
बड़ीबैठेन:
नंदगाँव से यात्रा आगे बढ़कर बड़ीबैठेन पहुँचती है।
जावगाँव:
श्री कृष्ण की बांसुरी की धुन सुनकर गोपियाँ उनके पास आ गईं। श्री कृष्ण ने उनका स्वागत किया और फिर कहा— “अब तुम व्रज लौट जाओ।” इसी कारण इस स्थान का नाम जावगाँव पड़ा।