कुमुदवन तालवन से 3 मील दूर है। व्रज के बारह वनों में से कुमुदवन तीसरा वन है।
कुमुदवन में दर्शनीय स्थल:
कुमुदवन के पास गिरधरपुर नामक गाँव में दुर्गा देवी का मंदिर है। कृष्णकुंड है। उसी कुंड पर श्री महाप्रभुजी की बैठकजी है। कपिलदेवजी का मंदिर है।
श्री बैठकजी का चरित्र:
जब श्री महाप्रभुजी कुमुदवन आए, तब उन्होंने कृष्णकुंड पर श्यामतमाल के वृक्ष के नीचे बैठकर तीन दिनों तक श्री भागवत कथा की।
जब एक सेवक, जिसका नाम कृष्णदास मेघन था, ने कुमुदवन में श्री ठाकुरजी की लीला के बारे में पूछा, तब श्री महाप्रभुजी ने सभी सेवकों को उस लीला का वर्णन किया।
एपिसोड:
कुमुदवन के पास गिरधरपुर नामक एक गाँव है। एक बार श्री ठाकुरजी वहाँ गाय चराने गए थे। उस समय गिरधरपुर में निवास करने वाली श्री दुर्गा देवी ने श्री ठाकुरजी का पूजन किया और उनसे निवेदन किया कि जब आप गोवर्धन पर्वत को उठाएँगे, तब इंद्र का अहंकार आहत होगा। इंद्र के आदेश से बारहों मेघ और उन्नचासों पवन व्रज पर आक्रमण करेंगे। उस समय मैं भी बिजली बनकर व्रज पर प्रहार करूँगी। इस कारण मुझे बहुत दुख हो रहा है।
श्री ठाकुरजी, श्री दुर्गा देवी की इस भावना से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उन्हें वरदान दिया कि जो भी उनकी पूजा करेगा, उसे मेरे दर्शन प्रत्यक्ष या स्वप्न में प्राप्त होंगे।
श्री ठाकुरजी की गोवर्धन लीला के संदर्भ में ही इस गाँव का नाम गिरधरपुर पड़ा।