पुराने शास्त्रों में कोटवन को कोटिबन कहा गया है। श्री कृष्ण ने इस घने वन में लता-पत्तों से कोट (घेरा) बनाकर लीला की थी, इसलिए इस स्थान का नाम कोटवन पड़ा।
एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार श्री यशोदाजी ने श्री कृष्ण से कहा, “लाला, मैंने सुना है कि तुम गोपियों के साथ रास करते हो, मुझे भी एक बार वह नृत्य दिखाओ।” श्री कृष्ण ने सोचा कि गोपियाँ श्री यशोदाजी के सामने नृत्य नहीं करेंगी। इसलिए उन्होंने अपनी इच्छा शक्ति से अनेक चौक बनाए और श्री यशोदाजी को कोटलीला दिखाई। इसी कारण यह वन कोटवन कहलाया।
यहाँ चोकर, कदंब और बोरड़ी के पेड़ अधिक हैं। यहाँ रासचौत्रा और शीतलकुंड स्थित हैं। श्री यशोदाजी नंदगाँव से यहाँ श्री कृष्ण की लीला देखने आई थीं और थक गई थीं। इस कुंड में स्नान करने से उन्हें शीतलता प्राप्त हुई, इसलिए इसका नाम शीतलकुंड पड़ा। शीतलकुंड पर श्यामतामाल वृक्ष के नीचे श्री ठाकुरजी की बैठक है।
कोटवन गाँव के उत्तर में सूर्यकुंड है। वहाँ श्री यशोदाजी ने करोड़ों सूर्यों को श्री कृष्ण की स्तुति करते हुए देखा था, इसलिए इस कुंड का नाम सूर्यकुंड पड़ा।