गथोली, जतिपुरा से दो मील दूर है। वहां से तोड़ नो घानो दो मील दूर है, और उससे लगभग ढाई मील आगे दिग बहाजगाम है। इस प्रकार कुल दूरी छह मील है। तोड़ नो घानो से बहाजगाम के रास्ते में सूर्यकुंड और बलभद्रकुंड आते हैं। यहां श्री दौजी के दर्शन होते हैं। रेवतीकुंड भी यहीं स्थित है।
दिग गाम को व्रज की सीमा में नहीं गिना जाता है। इसलिए कई बार तीर्थयात्री यहां के बजाय बहाजगाम में ठहरते हैं।
दिग गाम को 84 कोस परिक्रमा में शामिल नहीं किया गया है। इसका प्राचीन नाम दुर्गापुर था। दिग के महल वास्तुकला के सुंदर उदाहरण हैं, जिनमें गोपालभवन और सूरजभवन दो प्रमुख महल हैं।
भरतपुर के सम्राट पंचम पीठाधीश्वर श्री देवकीनंदनलालजी महाराज के अनुयायी थे। एक बार भरतपुर के सम्राट ने महाराजश्री से दिग आने का अनुरोध किया था ताकि इस स्थान को भी व्रज में शामिल किया जा सके। उस समय महाराजश्री ने आदेश दिया कि यदि वे लाडी और चौबाजी की पूजा करेंगे, तो उन्हें दिग्वास प्राप्त होगा। सम्राट ने वैसा ही किया। तब से इस स्थान को लत्थवन कहा जाता है और इसी घटना के बाद से व्रज्रयात्रा का पड़ाव भी यहीं होता है।