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सुरभि, सुरभिपति संग लिये, निरखि कृष्णमुख इन्दु |
कियौ राज अभिषेक तेह, भयौ कुंद गोविंद ||

गोविंदकुंड:

भगवान इंद्र ने यहाँ गोविंदाभिषेक किया था, इसीलिए इसका नाम गोविंदकुंड पड़ा। इंद्र ने भगवान को 'गोविंद' की उपाधि दी। मानसिगंगा की तरह यह कुंड भी दिव्य रूप में दूध से भरा हुआ है।

श्री महाप्रभुजी की बैठक:

गोविंदकुंड में कदंब के पेड़ के नीचे श्री महाप्रभुजी और श्री गिरिराजजी की बेथकजी हैं। श्री महाप्रभुजी यहां तीन दिनों तक रहे और भागवत पारायण किया। श्री महाप्रभुजी ने यहीं पर अपने एक सेवक कृष्णदास मेघन को श्री गिरिराजजी की कंदराओं के दिव्य दर्शन कराये थे। कंदरा के नीकुंज पर बैठा एक तोता लगातार अष्टाक्षर मंत्र का जाप कर रहा था, यह देखकर श्री कृष्णदास मेघन का अष्टाक्षर मंत्र का उच्चारण करने का अहंकार दांव पर लग गया। यहीं पर श्री महाप्रभुजी ने अपने सेवकों को श्री स्वामिनीजी द्वारा लिखित ग्रंथ 'श्रीकृष्णप्रेमामृत' की व्याख्या की थी। इस ग्रंथ में श्री स्वामिनीजी ने विरह के समय श्री ठाकोरजी के 118 नामों का गायन किया था। श्री स्वामिनीजी ने श्री ठाकोरजी से पूछा: मुझे यह ग्रंथ किसे दान करना चाहिए? उस समय श्री ठाकोरजी ने आदेश दिया: इसे किसी ऐसे व्यक्ति को दान करें जो आपके जैसा हो। श्री स्वामिनी जी ने श्री गिरिराज जी की शिलाओं पर इस ग्रंथ को अपने हाथों से लिखा था। श्री महाप्रभुजी उस शिला पर गए और उन्होंने उस ग्रंथ को पढ़ा। उस समय श्री कृष्णचैतन्य और केशव भट्ट भी वहाँ उपस्थित थे, लेकिन वे भी उस ग्रंथ को पढ़ नहीं पाए।