वी.एस. 1989, वैशाख वद 5
उन्हें प्रथम घर निधि श्री माथुरेशजी की सेवा का दायित्व प्राप्त हुआ। इसीलिए वे कोटा में बस गए। मुंबई के भूलेश्वर मंदिर की जिम्मेदारी भी उन पर आ गई, इसलिए वे वहाँ भी रहते हैं। उन्हें शास्त्रों का अच्छा ज्ञान था। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने विद्वानों को नियुक्त किया और अपना अधिकांश समय शास्त्रों के अध्ययन में व्यतीत किया। उन्हें संगीत का बहुत शौक था। वे हारमोनियम और पखावज बहुत ही सुंदर ढंग से बजाते थे।
साहित्य, संगीत